World Theatre Day Message | 2021

27th March 2021

थिएटर के अनेक रंग - भगीरथी बाई कदम द्वारा

वर्ल्ड थिएटर डे की शुभकामनाएं। मार्च २७, वर्ल्ड थिएटर डे पर जो लोग निरंतर रूप से थिएटर कर रहे हैं, उनके लिए हर दिन ही वर्ल्ड थिएटर डे है| इसलिए हमने कभी वर्ल्ड थिएटर डे कहकर खास कोई समारोह या नाटक का आयोजन नहीं किया। साल में ऐसे बहुत बार नाटकों के प्रदर्शन के दौरान, हर एक दिन, हर एक क्षण कई तरह की वेदना, चिंतन और ख़ुशीयां देते है
क्यों थिएटर महत्वपूर्ण है, किसके लिए महत्वपूर्ण है, मैं ये सब एक दो शब्दों में ही नहीं बयां कर सकती पहले कभी थिएटर मेरे लिए सिर्फ अपनी ख़ुशी के लिए करने वाली एक चीज़ थी, पर अब जंतरण भी देता हैपहले जब ख़ुशी से थिएटर करती थी, तो लोग मुझे कहते कि ये नाटक में तुमने बहुत अच्छा अभिनय किया, वाह-वाही दिया करते थे, नाटक के दूसरे दिन लोग मुझे पहचान लेते, तो लगता था की यही मेरी पहचान है, यही थिएटर का मूल उद्देश्य है। पर और करते करते थिएटर जब मेरे लिए विस्तार रूप से बढ़ता गया, जब मैंने और भी तरह का थिएटर करना शुरू किया, बच्चों के साथ, और फिर विशेष बच्चों के साथ, तब मेरा जो भी थिएटर के बारे में संकल्पना थी, वह सब बदल गया खासकर जब विशेष बच्चों के साथ मैंने नाटक करना शुरू किया, तब मुझे लगा की थिएटर सिर्फ ख़ुशी के लिए नहीं है थिएटर में एक ऐसी शक्ति है जिससे शायद सामाजिक बदलाव नहीं, लेकिन व्यक्तिगत रूप से बदलाव लाया जा सकता है वह एक चिकित्सा के रूप में तब काम करना शुरू किया जब मैंने विशेष बच्चों में वह विकास देखा, दोनों शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से, जो धीरे धीरे, मेरे आँखों के सामने उन बच्चों को विकसित होते देख कर आख़िरकार मुझे एहसास हुआ की ये थिएटर कमाल की चीज़ है ये चमत्कार है इससे हम कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी बदलाव ला सकते हैं , खासकर व्यक्तिगत रूप से। सिर्फ दर्शक ही नहीं, नाटक करते करते अभिनेताओं के अंदर धीरे धीरे कुछ बदलता जाता है, हर एक पात्र के साथ वह अपने पात्र को एक किनारे पर रख कर, जब नाटक करना शुरू करता है, एक दूसरा पात्र करना शुरू करता है, दुसरे पात्र को जब पहचानना और अपनाना शुरू करता है, तो वह एक दुसरे इंसान को भी समझने लगता है| और इससे अनजाने में ही धीरे धीरे सामाज को भी पहचनना शुरू करता है, जो कुछ भी हो रहा है देश में, दुनिया में, उसको समझना शुरू करता है और ये समाजीक या आर्थिक रूप से जो हो रहा , समाज में जो हंगामे चल रहे हैं, जो भी अवहेलना हो रही है, या जो कुछ अत्याचार चल रहा है, ये सब वह नाटक के ज़रिये समझना शुरू कर देता है, और तभी अंदर से एक तरह का क्रांतिकारी मनोभाव भी अपने आप पैदा होने लगता है


और नाटक ऐसे नहीं, की कोई एक इतिहास लेकर या कोई एक कहानी लेकर कर दिया, बच्चों को लेकर कुछ खेल मज़ाक या कुछ कॉमेडी कर दिया। ये कॉमेडी या हंसी मज़ाक में भी, हमारे आज में अभी क्या हो रहा है, हमारी परिस्थितियां क्या हैं, दूसरों की परिस्थितियां क्या हैं, भौगोलिक दृष्टि से क्या बदलाव हो रहे हैं हमारे आस पास, कहीं बाढ़ आ गया, कहीं कृषि लोगों ने आंदोलन किया, कहीं दलित के ऊपर कोई अत्याचार हुआ, कहीं मंदिर बनाया, कहीं मूर्ती बनाया, कहीं अपने स्वार्थ के लिये लोगों का इस्तेमाल हो रहा है, धर्म के आधार पर लोगों के अंदर भेदभाव ला रहे हैं एक निदेशक, या नाटक के अभिनेता की आँखों के सामने या दिमाग में ये सारी चीज़ एक क्रिया करने लगती है ये क्रिया या ये यंत्रणा को सहते सहते, अनजाने में कहीं न कहीं प्रदर्शन में ये दिखाई देने लगता हैसचमुच रिलेवेंट है थिएटर। क्यूंकि कल क्या हुआ, आज क्या हो रहा है और भविष्य में क्या होगा, हम किस दिशा में जा रहे हैं, उसमें इस सब की ज़रूरत है ये सब कुछ थिएटर में जुड़ा होता है ये नहीं कि थिएटर को इन सब से अलग कर दिया जाए, सिर्फ मनोरंजन बना दिया जाए, जिसे देखकर लोग बस खुश हो जाएं| सिर्फ खुश करना ही हमारा उद्द्येश है? मनोरंजन के साथ साथ, थिएटर एक ज़रिया है, जिससे आज का प्र्श्न उठा कर कुछ कहा जा सके और इसके लिए थिएटर बहुत बड़ा एक माध्यम है, जिसके जरिये हम ये सब बोल सकते हैं
प्रेक्षकों को लगता है की हम अभिनय कर रहे हैं। क्या हम सिर्फ अभिनय ही कर रहे हैं? नहीं! उन्हें लगता है की हम किसी ‘दुसरे’ का पात्र कर रहे हैं, 'नाटक' कर रहे हैं, और एक तरह का झूठ बोल रहे हैं| नहीं हम झूठ नहीं बोलते| हम झूठ को भी सत्य मान कर, सत्य होते हुए, सत्य के ज़रिये उसे बताने की कोशिश करते हैं। हम झूठे नहीं हैं। झूठ को भी सत्य करने वाले हम कैसे झूठे हो सकते हैं? इसलिए यंत्रणा ज़्यादा हम लोगों की होती है, थिएटर करने वालों की। दर्खाको के लिए वह मनोरंजन हो सकती है, पर करने वाले के लिए नहीं भी एक इंसान को ज़िंदा रहने के लिए, खाना जितना ज़रूरी है, पानी जितना ज़रूरी है, उतना ही ज़रूरी थिएटर भी है नहीं तो सब कुछ बिका हुआ हो जाएगा,और उसमे अपनापन कुछ नहीं रह जाएगा हमें अगर ‘कुछ भी’ कहना है तो उसके लिए थिएटर ही एक माध्यम है इस माध्यम को अगर हम छोड़ देंगे तो हम निस्तेज हो जाएंगे, हम शून्य हो जाएंगे। थिएटरवालो के लिये यह जीवन का एक हिस्सा है.



Bhagirathi Bai Kadam is a Guwahati based theatre maker. She helped form Seagull Theatre in Guwahati, and has also been very active with the Rangayan Repertory. Since passing out from Ninasam and the National School of Drama, she has performed in over 65 plays, and has translated numerous texts from Assamese to Kannada and vice versa. Her most notable performances include Nala Damayanti, Sohrab Rustum, Shantata Court Chalu Ahe, Hamlet, The Father, Aashad Ka Ek Din and many others. In 2015 she received the Swarna Jayanti Award from the Govt. of Karnataka for her contribution towards Indian theatre.


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THE MULTIFACETED THEATRE by Bhagirathi Bai Kadam

Wishing everyone a very Happy World Theatre Day! For people who have actively been working in the theatre, every day is considered World Theatre Day. Therefore, we have never celebrated World Theatre Day with a special ceremony or a special play. Through the course of the year, at many points during performances, every day, every moment offers different kinds of anguish, concerns and joy. Questions like – “Why is theatre important?” or “Who is it important for?” – I cannot articulate/address in just a few words. At one time, theatre, for me, was just something I did only for my own happiness, but not anymore. Earlier when I practised theatre for myself, I’d have audiences applaud my performance in a particular play and praise me. The day after the show when I’d be recognised, I would feel that this was my identity, the purpose of theatre. However, as I kept practising, the concept of theatre expanded. I explored other forms of theatre, working with children, and then specially-abled children. And that is when my concept of theatre changed. Working with specially abled children I realised that theatre is not just for personal happiness. Theatre has the power to bring about change, perhaps not in society as a whole, but in individuals. I began to see theatre as therapy when I saw the progress in specially-abled children both physiological and psychological. Seeing these children blossom right before my eyes, I realised that theatre is a magical thing. Theatre is miraculous! Theatre makes anything possible. With theatre we can bring about any change we want, especially at an individual level. As a play unfolds, there is a gradual transformation, not only in audiences, but also in the actor, with every character. The actors put aside their own personality when the play begins and take on another character/role. As they start identifying with and embracing this character, they start understanding other people. In the process, unconsciously, they also develop a better understanding of society, of what is going on in the world. The socio-economic changes taking place, the upheavals, the neglect, the persecution. As they get a better understanding of this through the medium of theatre, a revolutionary spirit emerges in them. Theatre is not just picking up a historical incident or a story and staging it, or children having fun on stage, or putting up a comedy. Even in a comedy, there has to be an awareness about what is happening in the now, our situation, the conditions that the others are in, the changes taking place around us in a geographical context, there is a flood somewhere, farmers are protesting elsewhere, a Dalit has been victimised, a temple is being built, a statue is erected, people are being exploited for selfish interests, religion is being used to bring about communal divisiveness. All these matters start affecting the minds of the director and the actors. Being affected thus and suffering the anguish starts reflecting in the performance, unknowingly. Truly, theatre is relevant. The events of the past, the present and the future, the direction that we are headed in. Theatre connects it all. Theatre cannot be isolated, cannot be viewed as just entertainment to amuse audiences. Is our purpose only to make people happy? Along with entertainment, theatre is a way to raise pertinent questions. It is a medium to address contemporary issues. Audiences believe we are acting. Are we only acting? They think we are playing a ‘character’, staging a ‘play’, indulging in a ‘lie’. No, we are not lying. We believe this lie to be true. And by doing so we attempt to share this truth with the audience. We are not liars. How can we be liars if we are bringing truth to the lie? And that is why we theatre-wallahs suffer/struggle with anguish. Theatre can be entertainment for the audiences, but not so for the practitioners. Just as food and water are essential for one’s survival, so is theatre. If not, everything will available for a price and we will lose our sense of kinship and empathy. If there is anything we want to say, theatre is the only medium. If we turn our backs on this form, we will lose our vitality. We will become ‘nothing’. For theatre wallahs, this is an integral part of life.


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World Theatre Day Message 2021 by Helen MIRREN

This has been such a very difficult time for live performance and many artists, technicians and craftsmen and women have struggled in a profession that is already fraught with insecurity. Maybe that always present insecurity has made them more able to survive this pandemic with wit and courage. Their imagination has already translated itself, in these new circumstances, into inventive, entertaining and moving ways to communicate, thanks of course in large part to the internet. Human beings have told each other stories for as long as they have been on the planet. The beautiful culture of theatre will live for as long as we stay here. The creative urge of writers, designers, dancers, singers, actors, musicians, directors, will never be suffocated and in the very near future will flourish again with a new energy and a new understanding of the world we all share. I can’t wait!